लालू ने कदम कदम पर कर्पूरी ठाकुर को धोखा दिया ।
डॉ. लोहिया की मृत्यु के बाद कर्पूरी ठाकुर सबसे बड़े समाजवादी नेता के रूप में उभरे। उन्होंने लोहिया के मिशन को आगे बढ़ाते हुए अपने मुख्यमंत्री- काल में जो आरक्षण नीति लागू की, वह कोटे के अंदर कोटा के प्रावधान पर आधारित था। उनका मानना था कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो यादव जैसी वर्चस्वशाली जाति के पंजे से लोहार,नुनिया,धुनिया,नाई,निषाद ,कुम्हार,केवट ,
मल्लाह ,दांगी,तेली,माली जैसी कमज़ोर जातियां अपना हक़ कभी न ले पाएंगी। यही कारण था कि बीपी मंडल से लेकर अनूपलाल यादव, रामलखन सिंह यादव तक ने कर्पूरी ठाकुर के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया था। तब लालू युवा सांसद थे।
वे भी कर्पूरी ठाकुर को परेशान करने के लिए नये- नये पैतरे आज़माते रहते थे।
1979 में उनके मुख्यमंत्री रहते साज़िशों का दौर आरम्भ हो गया था और उन्हे धोखा ही धोखा मिला एवं मुख्यमंत्री की कुर्सी भी गवानी पड़ी । चौधरी चरण सिंह जी भी इस मुहीम में शामिल हो गए थे। चरन सिंह को लगता था कि यादव मज़बूत जाति है ,इसे साध कर अपनी सियासत को परवान चढ़ाया जा सकता है। सच कहूं तो पिछड़ा के नाम पर यादववादी राजनीति करनेवाले नेताओं को कर्पूरी ठाकुर चुभने लगे थे ।
जब कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री थे ,तो लालू अपने रिश्तेदारों को विधान- सभा के अंदर व सचिवालयों में जुगाड़ टेक्नोलॉजी से फिट करने के लिए आये दिन सिफारिशें लेकर जाते रहते थे। समाजवादी विचारों की टकसाल कर्पूरी ठाकुर, लालू यादव को डांटने -फटकारने से भी संकोच नहीं करते थे। एक तरह से लालू को मतलबी एवं पदलोलुप किस्म के व्यक्ति मानते थे।
1985 के बिहार विधान-सभा चुनाव के बाद कर्पूरी ठाकुर नेता प्रतिपक्ष बने थे, तब कांग्रेस की सरकार शासन में थी।
1987 में लोकदल की गुटबाजी परवान पर थी l लोकदल के कुल विधायकों में यादव जाति के विधायकों की संख्या लगभग आधी थी l इस जाति के विधायक चाहते थे कि उनका स्वजाति ही नेता प्रतिपक्ष हो । समाजसेवी चेतना को तिलांजलि देकर यादव जाति के विधायकों ने अपना नेता अनूप यादव को चुन लिया l
और कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व को चुनौती दी l इस पूरे खेल के पीछे शरद यादव और लालू यादव का दिमाग काम कर रहा था l लालू यादव को लग रहा था कि आनेवाले दिनों में कर्पूरी ठाकुर की तरह अनूप यादव को भी निपटा देंगे और नेता प्रतिपक्ष बन जायेंगे l ऐसा हुआ भी l तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष शिवचन्द्र झा के सहयोग से अनूप यादव नेता प्रतिपक्ष बन गए और आगे चलकर अनूप यादव का स्थान लालू यादव ने ले लिया l उस समय लालू यादव ने कर्पूरी ठाकुर को "कपाती"( धूर्त ) ठाकुर कहकर अपमानित किया था l
कर्पूरी ठाकुर को इन जातिवादी नेताओं ने कितना अपमानित किया होगा, इसका अंदाज़ा कर्पूरी ठाकुर जी के इस कथन से लगाया जा सकता है - " अगर मै यह अपमान नहीं झेलना पड़ता"
कर्पूरी ठाकुर विधानसभा अध्यक्ष के पक्षपाती फैसले के विरुद्ध उच्च न्यायलय में एक याचिका दायर की थी l मार्च 1988 में फैसला आनेवाला था लेकिन उसके पहले ही अचानक 17 फरवरी 1988 को कर्पूरी ठाकुर की रहस्यमय मृत्यु हो गयी। इसकी संदेह की सुई आज भी लालू के इर्द- गिर्द ही घूमती है l
जब लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री थे तो रामसुंदर दास ने एक लम्बा पत्र लिख कर कर्पूरी ठाकुर की मौत की जांच की मांग की थी l लालू प्रसाद ने इस पत्र को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया और अपने राजनीतिक विरोधियों को ब्लैकमेल तो जरूर किया लेकिन जांच कराने की जहमत कभी नहीं उठायी l

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